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धारा 377 की वैधता पर अदालत ही करे फैसला : केंद्र

By HindusthanSamachar | Publish Date: Jul 11 2018 1:13PM
धारा 377 की वैधता पर अदालत ही करे फैसला : केंद्र
नई दिल्ली, 11 जुलाई (हि.स.)। समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध घोषित करने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आज केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि धारा 377 की वैधता पर केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे 'कोर्ट के विवेक' पर छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि सरकार इसका विरोध नहीं करती कि पार्टनर को चुनना किसी का मूल अधिकार है। कल यानि 10 जुलाई को तुषार मेहता ने कहा था कि हम अपना रुख बाद में बताएंगे। 10 जुलाई को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से मुकुल रोहतगी ने दलील दी थी कि निजता के अधिकार के मामले की सुनवाई करने वाली 9 जजों की बेंच में से 6 जजों की राय थी कि धारा 377 को अपराध के दायरे में लाने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला ग़लत था। रोहतगी ने कहा था कि एलजीबीटी समुदाय को 165 साल पुराने कानून के चलते सामाजिक प्रताड़ना और नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। सवाल किसी की व्यक्तितगत इच्छा का भी नहीं है , बल्कि उस रुझान का है जिसके साथ वो पैदा हुआ है। क्या महज रुझान अलग होने के चलते उनके अधिकारों से उन्हें वंचित कर दिया जाए। भारतीय दंड संहिता की धारा 377 यौन नैतिकता को ग़लत तरीके से परिभाषित करती है। 1680 के ब्रिटिश काल की नैतिकता कोई कसौटी नहीं है। प्राचीन भारत में इसको लेकर दृष्टिकोण अलग था। रोहतगी ने अपनी दलीलों की पुष्टि के लिए महाभारत काल के शिखंडी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि शिखंडी अंग्रेजों के पहले का महाभारतकाल का मामला है। तब जस्टिस आरएफ रोहिंटन ने कहा कि क्या आपका कहने का मतलब ये है कि ये प्राकृतिक न्याय था। हिन्दुस्थान समाचार/संजय/राधा रमण
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