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राफेल केस: लीक दस्तावेजों को साक्ष्य के तौर पर पेश करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

By HindusthanSamachar | Publish Date: Mar 14 2019 5:02PM
राफेल केस: लीक दस्तावेजों को साक्ष्य के तौर पर पेश करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

संजय

नई दिल्ली, 14 मार्च (हि.स.)। सुप्रीम कोर्ट राफेल मामले पर लीक दस्तावेजों को साक्ष्य के तौर पर पेश करने के मामले पर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान आज(गुरुवार को) अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने जो दस्तावेज लगाए हैं वे प्रिविलेज्ड हैं और उन्हें भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-123 के तहत साक्ष्य के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। जबकि याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार की चिंता राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं है बल्कि सरकारी अधिकारियों को बचाने की है, जिन्होंने राफेल डील में हस्तक्षेप किया।

अटार्नी जनरल ने कहा कि जो दस्तावेज दिए गए हैं उन्हें आरटीआई की धारा-8(1)(ए) के तहत छूट दी गई है। अटार्नी जनरल ने कहा कि राज्य के दस्तावेज बिना अनुमति के पब्लिश नहीं किए जा सकते हैं। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि वो इन दस्तावेजों को कोर्ट के रिकॉर्ड से हटा दें। तब जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा कि आरटीआई एक्ट का ऑफिशियल सिक्रेट एक्ट पर प्रभाव है। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि आरटीआई एक्ट की धारा-24 के तहत इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी प्रतिष्ठान भी भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के मामले पर सूचना देने को बाध्य हैं। जस्टिस जोसेफ ने अटार्नी जनरल को एक सर्कुलर दिखाया, जिसमें सरकार के पारदर्शिता की बात कही गई है। जस्टिस जोसेफ ने अटार्नी जनरल से कहा कि संसद ने आरटीआई एक्ट के जरिए क्रांति ला दी है।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण से पूछा कि क्या आप केंद्र के हलफनामे का कोई जवाब देना चाहते हैं तो प्रशांत भूषण ने कहा कि नहीं, हम बहस करेंगे। प्रशांत भूषण ने कहा कि अटार्नी जनरल की आपत्तियां सुरक्षा हितों के लिए नहीं हैं। इनमें से सभी दस्तावेज पहले से ही पब्लिक डोमेन में हैं। ऐसे में कोर्ट इस पर संज्ञान कैसे नहीं ले सकती है। प्रशांत भूषण ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-123 के मुताबिक प्रिविलेज का दावा उन दस्तावेजों के लिए नहीं किया जा सकता है, जो पब्लिक डोमेन में हों। ये सभी दस्तावेज पब्लिश हो चुके हैं इसलिए प्रिविलेज का दावा बेबुनियाद है।

प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार की चिंता राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं है बल्कि सरकारी अधिकारियों को बचाने की है, जिन्होंने राफेल डील में हस्तक्षेप किया। जब सरकार ने ही सभी रक्षा सौदों के नोट दाखिल किए हैं तो वे याचिकाकर्ताओं के दस्तावेजों पर प्रिविलेज का दावा कैसे कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने खुद ही अपने फ्रेंडली मीडिया को सूचनाएं लीक की हैं जैसे की रक्षा मंत्रालय के नोटिंग लीक किए गए। उन्होंने कहा कि सरकार भला नवंबर में ये कैसे जान सकती थी कि सीएजी बिना प्राइसिंग डिटेल के संपादित रिपोर्ट पेश करेगी। प्रशांत भूषण ने कहा सरकार ने पिछले कुछ दिनों से राफेल मामले पर मीडिया में खुलासों पर कोई एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने टू-जी और कोयला घोटाला मामले में सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर रंजीत सिन्हा के एंट्री रजिस्टर को बिना यह पूछे स्वीकार किया कि वे कहां से पाए गए थे।

प्रशांत भूषण ने प्रेस काउंसिल एक्ट की धारा-15(2)(3) का हवाला देते हुए कहा कि कानून भी पत्रकारों को अपने स्रोत की सुरक्षा का प्रिविलेज देता है। उन्होंने कहा कि यह मान्य कानून है कि कोर्ट को इससे मतलब नहीं होना चाहिए कि साक्ष्य के लिए दस्तावेज कैसे लाए गए हैं। उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें पेंटागन पेपर्स केस में वियतनाम युद्ध से संबंधित दस्तावेजों को भी छापने की अनुमति दी थी। भूषण के बाद याचिकाकर्ता अरुण शौरी ने कहा कि हम अटार्नी जनरल को धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने ये स्वीकार किया कि जो दस्तावेज हमने लगाए हैं वे फोटोकॉपी हैं।

पिछले 13 मार्च को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि सरकार की जानकारी या मंजूरी के बिना गोपनीय दस्तावेजों की फ़ोटोकॉपी हुई। केंद्र सरकार ने कहा है कि 2 देशों के बीच समझौते की गोपनीय बातें लीक की गईं। हलफनामे में कहा गया है कि विमान की युद्ध क्षमता की जानकारी सार्वजनिक की गई। इससे शत्रु देशों को फायदा हो सकता है। केंद्र सरकार ने कहा है कि याचिकाकर्ता अवैध तरीके से हासिल दस्तावेज कोर्ट में रख रहे हैं। इसका उन्हें अधिकार नहीं है। केंद्र सरकार ने कहा है कि दस्तावेज से चुनिंदा अंश रखकर भ्रम फैलाया जा रहा है। केंद्र सरकार ने कहा है कि याचिकाकर्ता या दस्तावेज लीक करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि पुनर्विचार याचिकाओं में कोई ऐसी बात नहीं जो कोर्ट के फैसले में कमी बता सकें। पिछले 6 मार्च को सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि रक्षा मंत्रालय से गोपनीय दस्तावेज चोरी किए गए। उन्हीं के आधार पर 'द हिंदू' अखबार में भ्रामक खबरें छापी जा रही हैं। चोरी के कागज़ात के आधार पर याचिका दाखिल की गई। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने इस बात को गंभीरता से लेते हुए पूछा कि बताइए इस मसले पर क्या कार्रवाई कर रहे हैं।

अटार्नी जनरल ने कहा था कि जिन दस्तावेजों पर 'द हिंदू' ने खबर छापी, उन पर साफ तौर पर 'गोपनीय' लिखा था। इन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। इसकी उपेक्षा कर खबर लिखी गई। ये ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का उल्लंघन है। इन्हीं दस्तावेजों को कोर्ट में भी पेश कर दिया गया। अटार्नी जनरल ने कहा था कि देश को आधुनिक विमानों की ज़रूरत है। यहां कुछ लोग सीबीआई जांच करवाने पर अड़े हुए हैं। हमारे पड़ोसी के पास एफ-16 है। हम सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। हमने अपने कुछ पायलटों को रफाल की जानकारी लेने फ्रांस भेजा है। तब जस्टिस के.एम. जोसफ ने कहा था कि अगर भ्रष्टाचार की जांच की मांग की जा रही है तो आप राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर बच तो नहीं सकते हैं। तब अटार्नी जनरल ने कहा था कि कागज़ात चोरी करवा के याचिका तैयार की गई। इनके लिए सज़ा दी जानी चाहिए।

अटार्नी जनरल ने कहा था कि हर बात की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती। क्या हमें कोर्ट को ये भी बताना होगा कि जंग क्यों हुई। शांति का फैसला क्यों लिया गया। कोर्ट याचिकाकर्ताओं से दस्तावेज पाने का जरिया पूछे। इनका तरीका उचित लगे तभी सुनवाई करें। अटार्नी जनरल ने कहा था कि दुनिया के किसी भी देश में रक्षा सौदे पर इस तरह कोर्ट में सुनवाई नहीं होती। तब जस्टिस केएम जोसफ ने कहा था कि तब तो बोफोर्स पर भी नहीं होनी चाहिए थी। जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा था कि आप कह रहे हैं कि कुछ दस्तावेज हमारे सामने आए हैं, हम उनको देखें ही नहीं? अटार्नी जनरल ने कोर्ट से आग्रह किया था कि ये मामला राजनीति का हथियार बना हुआ है। कोर्ट के किसी भी बयान के आधार पर सरकार को बदनाम करने की तैयारी है। आप कुछ कहने में संयम बरतें।

सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने कहा था कि टू-जी और कोयला घोटाला की भी जांच इसी तरह हुई। मुझे किसी सूत्र से कागज़ात मिले, मैंने याचिका दाखिल की। तब ये सवाल नहीं उठा था कि दस्तावेज कहां से आए। तब अटार्नी जनरल ने कहा था कि 'द हिंदू' और एएनआई के पास जो दस्तावेज है, वो चोरी हुआ था। पिछले 26 फरवरी को जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में हुई इन-चैंबर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की ओपन कोर्ट में सुनवाई का आदेश जारी किया था।

14 दिसंबर,2018 को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे की प्रक्रिया, राफेल की प्राइसिंग और ऑफसेट पार्टनर चुनने को भी हरी झंडी दे दी थी। राफेल डील पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रक्षा के मामलों की न्यायिक समीक्षा के लिए कोई युनिफॉर्म मापदंड नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि राफेल डील की प्रक्रिया को लेकर कभी भी संदेह नहीं किया गया। फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि कुछ लोगों की धारणा के आधार पर कोर्ट कोई आदेश नहीं दे सकता। इसलिए सभी याचिकाएं खारिज की जाती हैं।

कोर्ट ने कहा था कि कीमत की समीक्षा करना कोर्ट का काम नहीं जबकि एयरक्राफ्ट की ज़रूरत को लेकर कोई संदेह नहीं। कोर्ट ने फ़ैसले मे आफसेट पार्टनर चुनने पर कहा कि उसे किसी का फ़ेवर करने के सबूत नहीं मिले। इस मामले पर जब राजनीतिक बवाल मचा तब फैसले के अगले ही दिन 15 दिसंबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में राफेल सौदे पर एक संशोधित हलफनामा दायर किया।

केंद्र सरकार ने कहा कि पहले सौंपे गए हलफनामे में टाइपिंग की गलती हुई थी, जिसकी वजह से कोर्ट ने गलत व्याख्या की। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में साफ कहा कि सीएजी की रिपोर्ट अभी तक पीएसी ने नहीं देखी है। पहले सरकार ने कोर्ट को बताया था कि राफेल जेट की कीमत के निर्धारण और उससे संबंधित अन्य विवरण की रिपोर्ट सीएजी ने पीएसी के सौंपी थी जिसकी समीक्षा पीएसी ने की है। उसकी रिपोर्ट भी बाद में कोर्ट को सौंपी गई है।

हिन्दुस्थान समाचार

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