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मुख्यमंत्री के बयान पर भड़के कई संगठन

By HindusthanSamachar | Publish Date: Jul 1 2018 3:46PM
मुख्यमंत्री के बयान पर भड़के कई संगठन
इटानगर, 01 जुलाई (हि.स.)। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने हाल ही में इटानगर के एक गिरजाघर में आयोजित कार्यक्रम में अरुणाचल प्रदेश स्वतंत्रत धर्म (एपीएफआर) अधिनियम, 1978 को निरस्त करने की घोषणा की थी, जिसको लेकर राज्य के विभिन्न संगठन भड़क गए हैं। इसको लेकर राज्यभर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। गालो स्वदेशी विश्वास और सांस्कृतिक परिषद (जीआईएफसीसी) ने शनिवार को एक बयान जारी कर कहा है कि मुख्यमंत्री का यह बयान कि आगामी विधानसभा सत्र में इस अधिनियम को रद्द करने का प्रस्ताव पेश किया जाएगा, परिषद इसका जोरदार विरोध करती है। उन्होंने मुख्यमंत्री से अपने बयान को वापस लेने की मांग करते हुए राज्य के स्वदेशी धर्मों में विश्वास करने वालों से माफी मांगने का आह्वान किया है। परिषद ने कहा है कि मुख्यमंत्री के इस तरह के एक बयान ने जनजातीय लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाया है। जीआईएफसीसी ने कहा कि यह वर्तमान भाजपा की अगुवाई वाली सरकार (राज्य और केंद्र) का छुपा हुआ प्रमुख एजेंडा है, जो अरुणाचल प्रदेश के स्वदेशी धर्मों में विश्वास रखने वालों की भावनाओं के खिलाफ है। परिषद ने कहा है कि यह वर्तमान राज्य सरकार वोट बैंक की राजनीति के तहत इस तरह का कदम उठा रही है। सरकार का यह कदम राज्य के जनजातीय लोगों के बीच सांप्रदायिक विद्वेष का कारण बन सकता है। अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय लोगों के पूर्वजों की पहचान को मिटा सकता है। हालांकि अरुणाचल बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (एबीसीसी) ने मुख्यमंत्री के घोषणा का स्वागत किया है। एबीसीसी ने कहा कि हालांकि अरुणाचल प्रदेश सरकार को एपीएफआर अधिनियम, 1978 के अधिनियमन को समझने में 40 साल लग गए। यह बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं था। एपीएफआर अधिनियम को सही तरीक से लागू करने में सरकार असफल रही, क्योंकि इसे अरुणाचल प्रदेश में व्यावहारिक रूप से लागू नहीं किया गया। यह वास्तव में अरुणाचल प्रदेश का एक मृत कानून है। एबीसीसी ने कहा है कि अगर हमारे राज्य को इस कानून की आवश्यकता होती तो इस अधिनियमन के बनने के बाद व्यावहारिक रूप से लागू किया जाना चाहिए था लेकिन आज तक इसे लागू नहीं किया गया। इस लिहाज से इस कानून की कोई आवश्यकता नहीं है। हिन्दुस्थान समाचार/तागू/अरविंद/सुरभि /दधिबल
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