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(आलेख) कांग्रेस की सोच से निकला शब्द है 'हुआ तो हुआ'

15/05/2019

जयकृष्ण गौड़
मेरिकी दार्शनिक जार्ज संतायाना ने कहा है कि 'जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे उसे दोहराने का दंड भुगतते हैं।' भारत सनातन राष्ट्र है। हजारों वर्षों की सांस्कृतिक विरासत होने के साथ कई प्रकार के संघर्ष और युद्धों की घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं। कई आघातों के बाद भी संस्कृति के प्रवाह को कोई रोक नहीं सका। ऋग्वेद में कहा गया है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात उस एक प्रभु को विद्वान लोग अनेक नामों से पुकारते हैं। इसलिए कई पंथ संप्रदाय विकसित हुए। भारत भूमि पर पैदा हुए सभी पंथ संप्रदाय ने इस भारतभूमि की वंदना माता के रूप में की है। 'माताभूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या'। अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं इस मातृभूमि का पुत्र हूं। भारतभूमि पर पनपे जितने पंथ संप्रदाय और उपासना पद्धति हैं, उनके सभी अनुयायी भारत को मातृभूमि मानते हैं। सिख पंथ के गुरुओं ने न केवल हिन्दू धर्म संस्कृति की रक्षा की, बल्कि गुरु तेग बहादुर, गुरु गोविन्द आदि ने बलिदान भी दिया। सिख पंथ भी उसी सनातन हिन्दू संस्कृति का अनुयायी है। जब पाकिस्तान बना, तब मुस्लिमों ने हिन्दू-सिखों को ही निशाना बनाया। हिन्दू-सिखों के बीच रक्त संबंध हैं। 1983-84 में पाकिस्तान ने साजिश के द्वारा हिन्दू-सिखों के बीच विभाजन की रेखा खींचने की कोशिश की। 
विडंबना यह रही कि सिखों की न केवल धार्मिक भावना को आहत किया गया, वरन उनको सत्ता पर काबिज कांग्रेस ने निशाना भी बनाया। इंदिराजी की हत्या उनके दो सुरक्षा गार्डों ने की थी। चूंकि वे सिख थे। इसलिए कांग्रेस ने पूरी सिख कौम को निशाना बनाया। उनके साथ न केवल मारपीट की गई बल्कि उनकी संपत्तियों को लूटा-जलाया गया। हद तो तब हो गई जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सिख विरोधी दंगे को और भड़काने के लिए कहा कि 'जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती में कंपन होता है।' यह कथन दूरदर्शन से प्रसारित हुआ। इसके बाद पंजाब समेत दिल्ली, कानपुर, पटना बोकारो आदि शहरों में नरसंहार जैसी स्थिति पैदा हो गई। करीब तीन हजार सिखों की हत्या कर दी गई और उनकी संपत्ति को नष्ट किया गया। जमकर लूटपाट हुई। सिखों की हत्या के लिए दंगाइयों को भड़काने में कांग्रेसी नेता एच.एल. भगत, जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और कमलनाथ की प्रमुख भूमिका रही। इन्दौर में भी दंगे की आग भड़की। कांग्रेस नेता ललित जैन के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने इन्दौर की शान राजबाड़े में आग लगा दी। जब इन्दौर जल रहा था, आग की ऊंची लपटें उठ रही थीं, उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह इन्दौर आए। जब उनसे दंगों के बारे में पूछा गया तो उनका उत्तर था मैं क्या कर सकता हूं? उस समय इंदौर में कलेक्टर थे अजीत जोगी। सिखों पर अत्याचार करने के लिए उन्हें पुरस्कृत कर अर्जुन सिंह ने राज्यसभा का सदस्य बना दिया। बाद में वह छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने। इसी प्रकार एच.एल. भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर और कमलनाथ को उच्च पदों पर नियुक्त करके पुरस्कृत किया गया। कमलनाथ को पहले पंजाब का प्रभार दिया गया। वहां के सिखों ने उनका विरोध किया था अब वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। जिस तरह दंगों के जिम्मेदार कांग्रेसियों को पुरस्कृत किया गया, उससे यही जाहिर होता है कि कांग्रेसियों द्वारा प्रायोजित सिख विरोधी दंगों को रोकने के लिए न कांग्रेस सरकार गंभीर थी, न उन्हें किसी प्रकार का पश्चाताप था। 'हुआ तो हुआ' ये शब्द पहले से ही कांग्रेसियों के दिलोदिमाग में है। अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सलाहकार सैम पित्रोदा से जब 1984 के बारे में पूछा गया तो उनके मुंह से यही शब्द निकले कि 'हुआ तो हुआ'। जब भाजपा ने इसे चुनावी मु्ददा बनाया, पित्रोदा के खिलाफ सिखों के प्रदर्शन होने लगे। 
चूंकि छठे चरण के चुनाव के पहले सैम पित्रोदा के मुंह से निकले शब्द से राजनीतिक हलचल तेज हुई तो कांग्रेस को लगा कि हरियाणा, दिल्ली, पंजाब के चुनाव में कांग्रेस के लिए पित्रोदा का शब्द घातक होगा। दबाव बढ़ा तो पित्रोदा ने कहा कि मेरी हिन्दी ठीक नहीं होने से 'हुआ तो हुआ' शब्द निकल गए। कांग्रेस ने भी तुरंत पित्रोदा के बयान से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह उनका निजी विचार है। इससे कांग्रेस का कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पंजाब की एक रैली में कहा कि पित्रोदा को अपने कहे पर शर्म आनी चाहिए। उन्हें देश से माफी मांगनी चाहिए मुंह से निकली बात उसी तरह होती है, जैसे धनुष से निकला तीर वापस नहीं होता। कांग्रेस ने नाराज सिखों को मनाने के लिए डैमेज कंट्रोल करना चाहा, लेकिन कांग्रेस को जो नुकसान होना था, वह हो गया। राजनीतिक पंडित कहने लगे कि पित्रोदा का कथन तीस सीटों के चुनाव को प्रभावित करेगा। कांग्रेस को जब किसी नेता के बयान से हानि होने की संभावना लगती है तो हाईकमान यह कहकर उस कथन को नकार देता है कि यह उनके निजी विचार हैं। 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)